नींद उड़ गयी ये सोच कर, हमने क्या किया देश के लिए आज फिर सरहद पर बहा है, खून मेरी नींद के लिए।

नींद उड़ गयी ये सोच कर, हमने क्या किया देश के लिए आज फिर सरहद पर बहा है, खून मेरी नींद के लिए।

तन की मोहब्बत में, खुद को तपाये बैठे हैं, मरेंगे वतन के लिए, शर्त मौत से लगाये बैठे हैं।

तन की मोहब्बत में, खुद को तपाये बैठे हैं, मरेंगे वतन के लिए, शर्त मौत से लगाये बैठे हैं।

शेर सा जिगर और गजब के शौक रखता हूँ, अपने देश के खातिर हथेली पर जान रखता हूँ।

शेर सा जिगर और गजब के शौक रखता हूँ, अपने देश के खातिर हथेली पर जान रखता हूँ।

चल कुछ इस तरह से अपनी मिट्टी का क़र्ज़ चुकाते है, सहीद होकर इस देश पर अमर जवान कहलाते हैं।

चल कुछ इस तरह से अपनी मिट्टी का क़र्ज़ चुकाते है, सहीद होकर इस देश पर अमर जवान कहलाते हैं।

मोहब्बत ऐसी वो वतन से कर बैठे, दिन मोहब्बत का था और वो वतन पर मर मिटे।

मोहब्बत ऐसी वो वतन से कर बैठे, दिन मोहब्बत का था और वो वतन पर मर मिटे।

जो सुरक्षा का एहसास दिलाते हैं, जो हथेली पर रखकर जान, हमारी हिफाजत का जिम्मा उठाते हैं।

जो सुरक्षा का एहसास दिलाते हैं, जो हथेली पर रखकर जान, हमारी हिफाजत का जिम्मा उठाते हैं।

वह दिन भी आएगा जिस दिन मिट्टी का कर्ज चुकाऊंगा, शहीदी मिलेगी शान से और तिरंगे में लिपटकर घर जाऊंगा।

वह दिन भी आएगा जिस दिन मिट्टी का कर्ज चुकाऊंगा, शहीदी मिलेगी शान से और तिरंगे में लिपटकर घर जाऊंगा।

चीर देंगे फाड़ देंगे धरती में गाड़ देंगे, जो मां भारती पर उंगली उठाएगा, छाती पर तिरंगा गाड़ देंगे।

चीर देंगे फाड़ देंगे धरती में गाड़ देंगे, जो मां भारती पर उंगली उठाएगा, छाती पर तिरंगा गाड़ देंगे।

ये जो थोड़ा तुम्हें सुकून है, इस के पीछे वर्दी वालों का खून है।

ये जो थोड़ा तुम्हें सुकून है, इस के पीछे वर्दी वालों का खून है।

सिर्फ लड़कियाँ ही घर नहीं छोड़ती जनाब, लड़के भी छोड़ते हैं वे फ़ौजी कहलाते हैं।

सिर्फ लड़कियाँ ही घर नहीं छोड़ती जनाब, लड़के भी छोड़ते हैं वे फ़ौजी कहलाते हैं।

सरहद पर एक फौजी अपना वादा निभा रहा हैं, वो धरती माँ की मोहब्बत का कर्ज चुका रहा हैं।

सरहद पर एक फौजी अपना वादा निभा रहा हैं, वो धरती माँ की मोहब्बत का कर्ज चुका रहा हैं।

खद्दर ने फिर से कोई खेल खेला है, आज फिर से ख़ाकी लाल हुई है।

खद्दर ने फिर से कोई खेल खेला है, आज फिर से ख़ाकी लाल हुई है।

सीमा नहीं बना करतीं हैं काग़ज़ खींची लकीरों से, ये घटती-बढ़ती रहती हैं वीरों की शमशीरों से।

सीमा नहीं बना करतीं हैं काग़ज़ खींची लकीरों से, ये घटती-बढ़ती रहती हैं वीरों की शमशीरों से।

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