दुर्बल के साथ संधि ना करें। - आचार्य चाणक्य

दुर्बल के साथ संधि ना करें। – आचार्य चाणक्य

कभी भी अपनी कमजोरी को खुद उजागर न करो।

कभी भी अपनी कमजोरी को खुद उजागर न करो।

जिस धर्म में दया की शिक्षा ना मिले, उसे छोड़ देना ही बेहतर होता है।

जिस धर्म में दया की शिक्षा ना मिले, उसे छोड़ देना ही बेहतर होता है।

निम्न अनुष्ठानों (भूमि, धन-व्यापार, उधोग-धंधों) से आय के साधन भी बढ़ते हैं।

निम्न अनुष्ठानों (भूमि, धन-व्यापार, उधोग-धंधों) से आय के साधन भी बढ़ते हैं।

राजतंत्र से संबंधित घरेलू और बाह्य, दोनों कर्तव्यों को राजतंत्र का अंग कहा जाता है।

राजतंत्र से संबंधित घरेलू और बाह्य, दोनों कर्तव्यों को राजतंत्र का अंग कहा जाता है।

दुश्मन के साथ धोखा करने से धन का नाश होता है और ब्राह्मण के साथ धोखा करने से कुल का नाश होता है।

दुश्मन के साथ धोखा करने से धन का नाश होता है और ब्राह्मण के साथ धोखा करने से कुल का नाश होता है।

जब तक जीवन है तब तक हर चीज में आनंद है किंतु जैसे ही मृत्यु आकर जीवन का अंत कर देती है, इसके साथ ही हर चीज का अंत हो जाता है।

जब तक जीवन है तब तक हर चीज में आनंद है किंतु जैसे ही मृत्यु आकर जीवन का अंत कर देती है, इसके साथ ही हर चीज का अंत हो जाता है।

अपने मन का भेद दूसरों को देने वाले लोग सदा ही धोखा खाते हैं।

अपने मन का भेद दूसरों को देने वाले लोग सदा ही धोखा खाते हैं।

सोना यदि किसी गंदी जगह पर भी पड़ा हो तो उसे उठा लेना चाहिए।

सोना यदि किसी गंदी जगह पर भी पड़ा हो तो उसे उठा लेना चाहिए।

किसी भी कार्य में पल भर का भी विलम्ब ना करें। -आचार्य चाणक्य

किसी भी कार्य में पल भर का भी विलम्ब ना करें। -आचार्य चाणक्य

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